हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 4.16.6

मंडल 4 → सूक्त 16 → श्लोक 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 16
विश्वा॑नि श॒क्रो नर्या॑णि वि॒द्वान॒पो रि॑रेच॒ सखि॑भि॒र्निका॑मैः । अश्मा॑नं चि॒द्ये बि॑भि॒दुर्वचो॑भिर्व्र॒जं गोम॑न्तमु॒शिजो॒ वि व॑व्रुः ॥ (६)
समस्त मानव-हितकारी कार्यो को जानते हुए इंद्र ने अभिलाषापूर्ण एवं मित्ररूप मरुतों की सहायता से जल बरसाया था. जिन मरुतों ने अपने शब्द से पर्वत को भेद दिया था, उन्होंने इंद्र को प्रसन्न करने के लिए गोशाला को ढक दिया था. (६)
Knowing all the man-friendly works, Indra had rained water with the help of the maruts as a wishful and friendly manner. The maruts who had pierced the mountain with their word had covered the goshala to please Indra. (6)