ऋग्वेद (मंडल 4)
त्वं म॒हाँ इ॑न्द्र॒ तुभ्यं॑ ह॒ क्षा अनु॑ क्ष॒त्रं मं॒हना॑ मन्यत॒ द्यौः । त्वं वृ॒त्रं शव॑सा जघ॒न्वान्सृ॒जः सिन्धू॒ँरहि॑ना जग्रसा॒नान् ॥ (१)
हे महान् इंद्र! विस्तृत धरती और आकाश ने तुम्हारे बल को स्वीकार किया था. तुमने अपने बल से वृत्र को मारा एवं उसके द्वारा ग्रसित नदियों को स्वतंत्र किया. (१)
O great Indra! The vast earth and the sky accepted your strength. You struck the vritra with your own force and liberated the rivers affected by it. (1)