ऋग्वेद (मंडल 4)
स॒त्रा यदीं॑ भार्व॒रस्य॒ वृष्णः॒ सिष॑क्ति॒ शुष्मः॑ स्तुव॒ते भरा॑य । गुहा॒ यदी॑मौशि॒जस्य॒ गोहे॒ प्र यद्धि॒ये प्राय॑से॒ मदा॑य ॥ (७)
विश्व॒ का भरणपोषण करने वाले, प्रजापति के पुत्र एवं कामवर्षी इंद्र की शक्ति स्तुति करने वाले यजमान की सेवा करती है, वास्तविक रूप से यजमानों का पालन करने के लिए गुफा रूपी हृदय में उत्पन्न होती है, यजमान के गृह व यज्ञकर्म में स्थित रहती है, यजमानों की अभिलाषापूर्ति एवं प्रसन्नता के लिए उत्पन्न होती है तथा यजमानों का पालन करती है. (७)
The power of Indra, the son of Prajapati, who sustains the universe, serves the host who praises him, arises in the cave-like heart to actually obey the hosts, is located in the house and yagnakarma of the host, arises for the fulfillment and happiness of the hosts and obeys the hosts. (7)