ऋग्वेद (मंडल 4)
त्वा यु॒जा तव॒ तत्सो॑म स॒ख्य इन्द्रो॑ अ॒पो मन॑वे स॒स्रुत॑स्कः । अह॒न्नहि॒मरि॑णात्स॒प्त सिन्धू॒नपा॑वृणो॒दपि॑हितेव॒ खानि॑ ॥ (१)
हे सोम! इंद्र ने तुम्हारी मित्रता पाकर उसकी सहायता से मनुष्यों के लिए जल को प्रवाहित किया. उसने वृत्र को मारा, बहने वाले जल को प्रेरणा दी एवं जलधारा को रोकने वाले द्वार खोले. (१)
Hey Mon! Indra found your friendship and with his help, he flowed water to human beings. He hit the vritra, inspired the flowing water and opened the gates that blocked the stream. (1)
ऋग्वेद (मंडल 4)
त्वा यु॒जा नि खि॑द॒त्सूर्य॒स्येन्द्र॑श्च॒क्रं सह॑सा स॒द्य इ॑न्दो । अधि॒ ष्णुना॑ बृह॒ता वर्त॑मानं म॒हो द्रु॒हो अप॑ वि॒श्वायु॑ धायि ॥ (२)
हे सोम! इंद्र ने तुम्हारा सहारा लेकर तुरंत प्रेरक सूर्य के दो पहियों वाले रथ के एक पहिए को महान् बल से तोड़ डाला. वह रथ महान् अंतरिक्ष में ऊपर वर्तमान था. इंद्र ने अपने परम शत्रु सूर्य के सर्वत्रगामी रथ का पहिया नष्ट कर दिया. (२)
Hey Mon! Indra, supported you, immediately broke one of the wheels of the two-wheeled chariot of the inspirational sun with great force. That chariot was present up in the great space. Indra destroyed the wheel of his supreme enemy, the sun's all-round chariot. (2)
ऋग्वेद (मंडल 4)
अह॒न्निन्द्रो॒ अद॑हद॒ग्निरि॑न्दो पु॒रा दस्यू॑न्म॒ध्यंदि॑नाद॒भीके॑ । दु॒र्गे दु॑रो॒णे क्रत्वा॒ न या॒तां पु॒रू स॒हस्रा॒ शर्वा॒ नि ब॑र्हीत् ॥ (३)
हे सोम! युद्ध में तुम्हें पाकर शत्रु शक्तिशाली बने. इंद्र और अग्नि ने दोपहर से पहले ही शत्रुओं को समाप्त कर दिया. जैसे चोर रक्षारहित एवं जनशून्य स्थान से जाने वाले धनी लोगों को मार डालता है, उसी प्रकार इंद्र ने हजारों की संख्या वाली सेनाएं समाप्त कर दीं. (३)
Hey Mon! By getting you in the war, the enemies become powerful. Indra and Agni eliminated the enemies before noon. Just as a thief kills the rich who go from the unprotected and uninhabited place, Indra ended the armies of thousands. (3)
ऋग्वेद (मंडल 4)
विश्व॑स्मात्सीमध॒माँ इ॑न्द्र॒ दस्यू॒न्विशो॒ दासी॑रकृणोरप्रश॒स्ताः । अबा॑धेथा॒ममृ॑णतं॒ नि शत्रू॒नवि॑न्देथा॒मप॑चितिं॒ वध॑त्रैः ॥ (४)
हे इंद्र! तुमने इन दस्युजनों को सब गुणों से हीन किया एवं यज्ञकर्मरहित दासों को निंदित बनाया. हे इंद्र एवं सोम! तुम दोनों शत्रुओं को बाधा पहुंचाओ, उन्हें मारो और उनकी हत्या के बदले में यजमानों से पूजा स्वीकार करो. (४)
O Indra! You have despised these bandits from all virtues and condemned the dasas without sacrificial deeds. O Indra and Mon! Hinder both enemies, kill them and accept worship from the hosts in exchange for their killing. (4)
ऋग्वेद (मंडल 4)
ए॒वा स॒त्यं म॑घवाना यु॒वं तदिन्द्र॑श्च सोमो॒र्वमश्व्यं॒ गोः । आद॑र्दृत॒मपि॑हिता॒न्यश्ना॑ रिरि॒चथुः॒ क्षाश्चि॑त्ततृदा॒ना ॥ (५)
हे सोम! तुम और इंद्र-दोनों ने अश्वों एवं गायों का समूह दान किया. तुमने पणियों द्वारा रोकी गई गायों को एवं उन पणियों की भूमियों को बल द्वारा मुक्त किया था. हे इंद्र एवं सोम! तुम दोनों शत्रुनाशकारियों ने जो किया, वह सत्य है. (५)
Hey Mon! You and Indra both donated a group of horses and cows. You freed the cows stopped by the pangs and the lands of those men by force. O Indra and Mon! What you two enemies have done is the truth. (5)