ऋग्वेद (मंडल 4)
क॒था ह॒ तद्वरु॑णाय॒ त्वम॑ग्ने क॒था दि॒वे ग॑र्हसे॒ कन्न॒ आगः॑ । क॒था मि॒त्राय॑ मी॒ळ्हुषे॑ पृथि॒व्यै ब्रवः॒ कद॑र्य॒म्णे कद्भगा॑य ॥ (५)
हे अग्नि! तुम वरुण एवं सविता के समीप हमारी निंदा क्यों करते हो? हमसे क्या अपराध हुआ है? तुमने कामवर्षी मित्र, पृथ्वी, अर्यमा एवं भग को हमारा पाप क्यों बताया? (५)
O agni! Why do you condemn us near Varun and Savita? What crime have we had? Why did you tell the workfriends, the earth, the aryama and the lord, our sins? (5)