हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 4.33.3

मंडल 4 → सूक्त 33 → श्लोक 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 4)

ऋग्वेद: | सूक्त: 33
पुन॒र्ये च॒क्रुः पि॒तरा॒ युवा॑ना॒ सना॒ यूपे॑व जर॒णा शया॑ना । ते वाजो॒ विभ्वा॑ँ ऋ॒भुरिन्द्र॑वन्तो॒ मधु॑प्सरसो नोऽवन्तु य॒ज्ञम् ॥ (३)
ऋभुओं ने कटे हुए काठ के समान जीर्ण एवं पड़े रहने वाले अपने माता-पिता को नित्य तरुण बना दिया. वे वाज, विभु और ऋभु इंद्र के साथ मिलकर सोमरस का पान करें एवं हमारे यज्ञों की रक्षा करें. (३)
The sages made their parents, who were as dilapidated and lying like a cut wood, young. They, along with Vaj, Vibhu and Ribhu Indra, drink the somras and protect our yagnas. (3)