ऋग्वेद (मंडल 4)
यो वः॑ सु॒नोत्य॑भिपि॒त्वे अह्नां॑ ती॒व्रं वा॑जासः॒ सव॑नं॒ मदा॑य । तस्मै॑ र॒यिमृ॑भवः॒ सर्व॑वीर॒मा त॑क्षत वृषणो मन्दसा॒नाः ॥ (६)
हे अन्न के स्वामी एवं कामवर्षी ऋभु.ओ! दिन की समाप्ति पर जो यजमान तुम्हारी प्रसन्नता के लिए तेज नशे वाला सोम निचोड़ता है, तुम प्रसन्न होकर उसे पुत्र-पौत्रों से युक्त संपत्ति देते हो. (६)
O Lord of the Food and the Year-old, Ribhu.o! At the end of the day, the host who squeezes the sharply drunk som for your happiness, you are pleased to give him property with sons and grandsons. (6)