ऋग्वेद (मंडल 4)
यत्तृ॒तीयं॒ सव॑नं रत्न॒धेय॒मकृ॑णुध्वं स्वप॒स्या सु॑हस्ताः । तदृ॑भवः॒ परि॑षिक्तं व ए॒तत्सं मदे॑भिरिन्द्रि॒येभिः॑ पिबध्वम् ॥ (९)
हे शोभन हाथों वाले ऋभुओ! तुमने रमणीय कर्म की इच्छा से तीसरे सवन को रमणीय सोमरस के दान से युक्त बनाया था, इसलिए तुम प्रमुदित इंद्रियों से भली प्रकार निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ. (९)
O you with beautiful hands! You made the third suvan with the donation of the delightful somras out of the desire for delightful karma, so you should drink the somras well squeezed from the loving senses. (9)