ऋग्वेद (मंडल 4)
उ॒त वा॒जिनं॑ पुरुनि॒ष्षिध्वा॑नं दधि॒क्रामु॑ ददथुर्वि॒श्वकृ॑ष्टिम् । ऋ॒जि॒प्यं श्ये॒नं प्रु॑षि॒तप्सु॑मा॒शुं च॒र्कृत्य॑म॒र्यो नृ॒पतिं॒ न शूर॑म् ॥ (२)
हे द्यावा-पृथ्वी! तुम दोनों गमनशील, बहुत से शत्रुओं को रोकने वाली, समस्त प्रजाओं की रक्षा करने वाली, शोभन-गति वाली, दीप्तिशालिनी, तेज चलने वाली एवं राजा के समान शूर दधिक्रा को धारण करते हो. (२)
This is the earth! You both wear a moving, a protector of many enemies, protecting all the people, a beautical, a radiant, a fast-moving, and a king-like brave. (2)