ऋग्वेद (मंडल 4)
इन्द्रा॑ ह॒ यो वरु॑णा च॒क्र आ॒पी दे॒वौ मर्तः॑ स॒ख्याय॒ प्रय॑स्वान् । स ह॑न्ति वृ॒त्रा स॑मि॒थेषु॒ शत्रू॒नवो॑भिर्वा म॒हद्भिः॒ स प्र शृ॑ण्वे ॥ (२)
हे इंद्र एवं वरुण! जो व्यक्ति हव्यरूप में अन्न लेकर मित्रता के लिए तुम दोनों को भाई बनाता है, वह अपने पापों का नाश करता है. वह युद्ध में शत्रुओं को नष्ट करके महान् रक्षासाधनों के कारण प्रसिद्ध होता है. (२)
O Indra and Varuna! The person who takes food in the form of a week and makes you brothers for friendship destroys his sins. He is famous for his great defense by destroying enemies in war. (2)