ऋग्वेद (मंडल 4)
क उ॑ श्रवत्कत॒मो य॒ज्ञिया॑नां व॒न्दारु॑ दे॒वः क॑त॒मो जु॑षाते । कस्ये॒मां दे॒वीम॒मृते॑षु॒ प्रेष्ठां॑ हृ॒दि श्रे॑षाम सुष्टु॒तिं सु॑ह॒व्याम् ॥ (१)
यज्ञ के योग्य देवों में कौन देव इस स्तुति को सुनेगा? कौन वंदनशील देव इसे स्वीकार करेगा? हम इस अतिशय प्रिय, द्युतियुक्त, शोभन-अन्न से युक्त, इस उत्तम स्तुति को किस देव के हृदय में स्थान दिलाएं? (१)
Which of the deities worthy of the yajna will hear this praise? Who will accept this? In which God shall we place this very beloved, beautiful, rich, rich, good praise? (1)
ऋग्वेद (मंडल 4)
को मृ॑ळाति कत॒म आग॑मिष्ठो दे॒वाना॑मु कत॒मः शम्भ॑विष्ठः । रथं॒ कमा॑हुर्द्र॒वद॑श्वमा॒शुं यं सूर्य॑स्य दुहि॒तावृ॑णीत ॥ (२)
हमें कौन सा देवता सुखी करेगा? कौन देवता हमारे यज्ञ में सबसे पहले आएगा? देवों के मध्य कौन सा देव हमारा अधिक कल्याण करेगा? शीघ्र दौड़ने वाला रथ कौन सा है, जिसने सूर्य की पुत्री का वरण पाया है? तात्पर्य यह है कि उक्त गुण केवल अश्चिनीकुमारों में ही हैं. (२)
Which god will make us happy? Which god will come first in our yajna? Which god among the gods will do us more good? Which is the fast-moving chariot which has got the choice of the daughter of the sun? This means that the said qualities are only in the Aschinikumaras. (2)
ऋग्वेद (मंडल 4)
म॒क्षू हि ष्मा॒ गच्छ॑थ॒ ईव॑तो॒ द्यूनिन्द्रो॒ न श॒क्तिं परि॑तक्म्यायाम् । दि॒व आजा॑ता दि॒व्या सु॑प॒र्णा कया॒ शची॑नां भवथः॒ शचि॑ष्ठा ॥ (३)
रात्रि बीतने पर इंद्र अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं. हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों उसी प्रकार गतिशील होकर सोम निचोड़ने वाले दिवसों में शीघ्र आओ. स्वर्ग से आए हुए, दिव्य गुणयुक्त एवं शोभन गति वाले तुम दोनों के कर्मो में कौन सा कर्म श्रेष्ठ है? (३)
As the night passes, Indra shows his power. O Ashwinikumaro! You both come quickly to the days of squeezing the mon in the same way. Which of the following deeds is best among the deeds of both of you who have come from heaven, of divine quality and of good speed? (3)
ऋग्वेद (मंडल 4)
का वां॑ भू॒दुप॑मातिः॒ कया॑ न॒ आश्वि॑ना गमथो हू॒यमा॑ना । को वां॑ म॒हश्चि॒त्त्यज॑सो अ॒भीक॑ उरु॒ष्यतं॑ माध्वी दस्रा न ऊ॒ती ॥ (४)
कौन सी स्तुति लुम दोनों के गुणों की सीमा हो सकती है? हे अश्चिनीकुमारो! किस स्तुति द्वारा बुलाए जाने पर तुम दोनों हमारे पास आओगे? तुम्हारे महान् क्रोध को समीप में कोन सह सकता है? हे जल निर्माता एवं शत्रुनाशकारी अश्चिनीकुमारो! हमारी रक्षा करो. (४)
Which praise lum can be the limit of the qualities of both? O aschinikumaro! By what praise will you both come to us when called? Who can bear your great wrath in the vicinity? O water builder and enemy builder Aschinikumaro! Protect us. (4)
ऋग्वेद (मंडल 4)
उ॒रु वां॒ रथः॒ परि॑ नक्षति॒ द्यामा यत्स॑मु॒द्राद॒भि वर्त॑ते वाम् । मध्वा॑ माध्वी॒ मधु॑ वां प्रुषाय॒न्यत्सीं॑ वां॒ पृक्षो॑ भु॒रज॑न्त प॒क्वाः ॥ (५)
हे अश्चिनीकुमारो! तुम दोनों का रथ स्वर्गलोक के चारों ओर भली प्रकार चलता है एवं समुद्र से तुम्हारे पास आता है. हे जल-निर्माता एवं शत्रुविनाशक अश्विनीकुमारो! अध्वर्यु लोग मधुर दूध के साथ सोमरस मिलाते हुए भुने हुए जौ लेकर उपस्थित हैं. (५)
O aschinikumaro! The chariot of both of you moves well around paradise and comes to you from the sea. O water-maker and anti-enemy AshwiniKumaro! The adhwaryu people are present with roasted barley while mixing somras with sweet milk. (5)
ऋग्वेद (मंडल 4)
सिन्धु॑र्ह वां र॒सया॑ सिञ्च॒दश्वा॑न्घृ॒णा वयो॑ऽरु॒षासः॒ परि॑ ग्मन् । तदू॒ षु वा॑मजि॒रं चे॑ति॒ यानं॒ येन॒ पती॒ भव॑थः सू॒र्यायाः॑ ॥ (६)
बादल ने अपने जल से तुम दोनों के घोड़ों को भिगोया था. तुम्हारे दीप्तियुक्त घोड़े पक्षियों के समान तेज चलते हैं. तुम्हारा वह रथ भली प्रकार प्रसिद्ध है, जिस पर तुम सूर्यपुत्री को बैठाकर लाए थे. (६)
The cloud had soaked the horses of both of you with its water. Your radiant horses walk as fast as birds. Your chariot is well known on which you brought the daughter of the sun by sitting. (6)
ऋग्वेद (मंडल 4)
इ॒हेह॒ यद्वां॑ सम॒ना प॑पृ॒क्षे सेयम॒स्मे सु॑म॒तिर्वा॑जरत्ना । उ॒रु॒ष्यतं॑ जरि॒तारं॑ यु॒वं ह॑ श्रि॒तः कामो॑ नासत्या युव॒द्रिक् ॥ (७)
हे समान मन वाले अश्चिनीकुमारो! हम जो स्तुति तुम्हारे समीप भेजते हैं, वह हमारे लिए फल देने वाली हो. हे सुंदर अन्न वाले अश्विनीकुमारो! तुम स्तुति करने वाले की रक्षा करो. हे नासत्यो! हमारी कामना तुम्हारे ही आश्रित है. (७)
O ashchinikumaro with the same mind! The praise we send to you, let it bear fruit for us. O ashwinikumaro with beautiful food! You protect the praise-giver. O nastyo! Our desire is dependent on yours. (7)