ऋग्वेद (मंडल 4)
ता आ च॑रन्ति सम॒ना पु॒रस्ता॑त्समा॒नतः॑ सम॒ना प॑प्रथा॒नाः । ऋ॒तस्य॑ दे॒वीः सद॑सो बुधा॒ना गवां॒ न सर्गा॑ उ॒षसो॑ जरन्ते ॥ (८)
सर्वत्र समान एवं प्रसिद्ध उषाएं पूर्व दिशा में केवल आकाश से सब जगह घूमती हैं एवं यज्ञशाला को ज्ञान का विषय बनाती हुई जल उत्पन्न करने वाली किरणों के सामन प्रशंसापात्र बनती हैं. (८)
The common and famous ushas everywhere move from the sky to the east only and become praiseworthy of the water-producing rays, making the yajnashala a matter of knowledge. (8)