ऋग्वेद (मंडल 4)
प्रति॑ भ॒द्रा अ॑दृक्षत॒ गवां॒ सर्गा॒ न र॒श्मयः॑ । ओषा अ॑प्रा उ॒रु ज्रयः॑ ॥ (५)
प्रशंसा के योग्य किरणें दिखाई देती हैं. उषा ने संसार को वर्षा की धारा के समान तेज से भर दिया है. (५)
Rays worthy of praise appear. Usha has filled the world with as much as the current of rain. (5)