ऋग्वेद (मंडल 4)
शुना॑सीरावि॒मां वाचं॑ जुषेथां॒ यद्दि॒वि च॒क्रथुः॒ पयः॑ । तेने॒मामुप॑ सिञ्चतम् ॥ (५)
हे शुन एवं सीर! तुम हमारी स्तुति को स्वीकार करो. तुमने आकाश में जिस जल का निर्माण किया था, उसीसे तुम इस धरती को सींचो. (५)
O Shun and Sir! You accept our praise. Water you created in the sky, from which you irrigated this earth. (5)