ऋग्वेद (मंडल 4)
अ॒स्माकं॑ जोष्यध्व॒रम॒स्माकं॑ य॒ज्ञम॑ङ्गिरः । अ॒स्माकं॑ शृणुधी॒ हव॑म् ॥ (७)
हे अंगिरा अग्नि! तुम हमारे यज्ञ की सेवा करो, हमारे हवि को स्वीकार करो तथा हमारे स्तोत्र को सुनो. (७)
O Angira Agni! You serve our yajna, accept our glory and listen to our hymns. (7)