हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 5.13.2

मंडल 5 → सूक्त 13 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 13
अ॒ग्नेः स्तोमं॑ मनामहे सि॒ध्रम॒द्य दि॑वि॒स्पृशः॑ । दे॒वस्य॑ द्रविण॒स्यवः॑ ॥ (२)
हम लोग धन की अभिलाषा से दीप्तिशाली एवं आकाश को छूने वाले अग्नि की पुरुषार्थ सिद्ध करने वाली स्तुति करते हैं. (२)
We praise the lust for wealth, the glorious and the agni that touches the sky, proving its purpose. (2)