हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 5.13.4

मंडल 5 → सूक्त 13 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 13
त्वम॑ग्ने स॒प्रथा॑ असि॒ जुष्टो॒ होता॒ वरे॑ण्यः । त्वया॑ य॒ज्ञं वि त॑न्वते ॥ (४)
हे सदा प्रसन्न होता, लोगों द्वारा वरण करने योग्य एवं पुष्ट अग्नि! यजमान तुम्हारी सहायता से यज्ञ का विस्तार करते हैं. (४)
O you are always happy, a agni that is chosen and reinforced by the people! Hosts extend the yajna with your help. (4)