ऋग्वेद (मंडल 5)
उ॒त त्ये मा॑ ध्व॒न्य॑स्य॒ जुष्टा॑ लक्ष्म॒ण्य॑स्य सु॒रुचो॒ यता॑नाः । म॒ह्ना रा॒यः सं॒वर॑णस्य॒ ऋषे॑र्व्र॒जं न गावः॒ प्रय॑ता॒ अपि॑ ग्मन् ॥ (१०)
लक्ष्मण के पुत्र ध्वन्यक द्वारा दिए हुए दीप्तिशाली एवं वहन करने में समर्थ घोड़े हमें ढोवें? गाएं जिस प्रकार गोचर भूमि में जाती हैं, उसी प्रकार ध्वन्यक द्वारा दिया हुआ धन मुझ संवरण ऋषि के घर में आवे. (१०)
Should we carry the bright and capable horse given by the phonetic son of Lakshman? Just as the cows go to the transit land, so should the money given by the phonetic come to the house of the sage. (10)