हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 5.34.7

मंडल 5 → सूक्त 34 → श्लोक 7 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 34
समीं॑ प॒णेर॑जति॒ भोज॑नं मु॒षे वि दा॒शुषे॑ भजति सू॒नरं॒ वसु॑ । दु॒र्गे च॒न ध्रि॑यते॒ विश्व॒ आ पु॒रु जनो॒ यो अ॑स्य॒ तवि॑षी॒मचु॑क्रुधत् ॥ (७)
इंद्र दान न करने वाले का धन चुराने के लिए लोभी बनियों के समान जाते हैं एवं मानवशोभा बढ़ाने वाले उस धन को हव्यदाता यजमान को देते हैं. जो व्यक्ति इंद्र के बल को उत्तेजित करता है वह विपत्ति में पड़ता है. (७)
Indra goes like greedy banias to steal the money of the one who does not donate and those who increase human adornment give that money to the havyadata host. The person who stimulates the force of Indra falls into adversity. (7)