ऋग्वेद (मंडल 5)
शुष्मा॑सो॒ ये ते॑ अद्रिवो मे॒हना॑ केत॒सापः॑ । उ॒भा दे॒वाव॒भिष्ट॑ये दि॒वश्च॒ ग्मश्च॑ राजथः ॥ (३)
हे वज्रधारी इंद्र! पूजनीय, प्रसिद्धकर्म वाले एवं तुम्हारे बलरूप मरुत् तथा तुम दोनों ही धरती पर मनचाही गति के लिए समर्थ हो. (३)
O thunderbolt Indra! Both the revered, the famous, the doers and your strength, the desert and you are capable of the desired movement on earth. (3)