हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 5.4.11

मंडल 5 → सूक्त 4 → श्लोक 11 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 4
यस्मै॒ त्वं सु॒कृते॑ जातवेद उ लो॒कम॑ग्ने कृ॒णवः॑ स्यो॒नम् । अ॒श्विनं॒ स पु॒त्रिणं॑ वी॒रव॑न्तं॒ गोम॑न्तं र॒यिं न॑शते स्व॒स्ति ॥ (११)
हे जातवेद अग्नि! तुम जिस उत्तम कर्मशील यजमान के प्रति सुखकारी अनुग्रह करते हो, वह अश्व, पुत्र, वीर्य एवं गायों से युक्त होकर नाशहीन धन पाता है. (११)
O Jativeda Agni! The good working host to whom you do soothing grace, he gets perishable wealth, full of horse, son, semen and cows. (11)