हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 5.41.10

मंडल 5 → सूक्त 41 → श्लोक 10 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 41
वृष्णो॑ अस्तोषि भू॒म्यस्य॒ गर्भं॑ त्रि॒तो नपा॑तम॒पां सु॑वृ॒क्ति । गृ॒णी॒ते अ॒ग्निरे॒तरी॒ न शू॒षैः शो॒चिष्के॑शो॒ नि रि॑णाति॒ वना॑ ॥ (१०)
हम अंतरिक्ष में स्थित एवं वर्षा करने वाले, बादल के गर्भरूप एवं जल के रक्षक विद्युतरूप अग्नि की स्तुति पापरहित एवं शोभन स्तोत्रों द्वारा करते हैं. तीन स्थानों में व्याप्त वे अग्नि मेरे गमन के समय अपनी लपटों से मुझ पर क्रोध नहीं करते, अपितु प्रज्वलित होकर जंगलों को जलाते हैं. (१०)
We praise the agni in space and the raining, the womb of the cloud and the protector of water, the electric agni, through sinless and adorning hymns. Those agnis in three places do not anger me with their flames at the time of my journey, but ignite and burn the forests. (10)