हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 5.42.2

मंडल 5 → सूक्त 42 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 42
प्रति॑ मे॒ स्तोम॒मदि॑तिर्जगृभ्यात्सू॒नुं न मा॒ता हृद्यं॑ सु॒शेव॑म् । ब्रह्म॑ प्रि॒यं दे॒वहि॑तं॒ यदस्त्य॒हं मि॒त्रे वरु॑णे॒ यन्म॑यो॒भु ॥ (२)
जिस प्रकार माता अपने पुत्र को छाती से लगा लेती है, उसी प्रकार मेरे हृदयहारी एवं उत्तम सुखदाता स्तोत्र को अदिति स्वीकार करें. जो स्तुतिवचन प्रिय, देवहितकारी एवं आनंददाता हैं, उन्हें हम मित्र और वरुण को देते हैं. (२)
Just as a mother attaches her son to the chest, so may Aditi accept my heart-warming and best comforting hymn. We give the praises which are loving, god-giving and pleasing, to friends and to Varuna. (2)