ऋग्वेद (मंडल 5)
दश॒ क्षिपो॑ युञ्जते बा॒हू अद्रिं॒ सोम॑स्य॒ या श॑मि॒तारा॑ सु॒हस्ता॑ । मध्वो॒ रसं॑ सु॒गभ॑स्तिर्गिरि॒ष्ठां चनि॑श्चदद्दुदुहे शु॒क्रमं॒शुः ॥ (४)
ऋत्विजों की शीघ्रता करने वाली दस उंगलियां एवं सोमरस निचोड़ने वाले हाथ पत्थरों को पकड़ते हैं. शोभन उंगलियों वाला ऋत्विज् प्रसन्न होता हुआ उच्च पर्वत पर उत्पन्न सोमलता का मधुर रस टपकाता है. सोमलता से श्वैत रस निकलता है. (४)
Ten fingers that accelerate the ritvijas and the hands that squeeze the somers hold the stones. The sweet juice of Somlata, born on a high mountain, is pleased. Shavita juice comes out of somlata. (4)