हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 5.45.6

मंडल 5 → सूक्त 45 → श्लोक 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 45
एता॒ धियं॑ कृ॒णवा॑मा सखा॒योऽप॒ या मा॒ताँ ऋ॑णु॒त व्र॒जं गोः । यया॒ मनु॑र्विशिशि॒प्रं जि॒गाय॒ यया॑ व॒णिग्व॒ङ्कुरापा॒ पुरी॑षम् ॥ (६)
हे मित्रो! आओ. हम लोग मिलकर स्तुति करें. इन स्तुतियों से चुराई गई गायों के भवन का द्वार खुलता है. इन्हीं से मनु ने विशिशिप्र नामक असुर को जीता था एवं इन्हीं की सहायता से वणिक तुल्य कक्षीवान्‌ ने वन में जाकर जल पाया था. (६)
Oh, my friends! Come. Let us praise together. These hymns open the door to the stolen cows' building. From these, Manu had won the asura named Vishishitra and with the help of them, the vanik equivalent Kandivan went to the forest and got water. (6)