ऋग्वेद (मंडल 5)
वि त॑न्वते॒ धियो॑ अस्मा॒ अपां॑सि॒ वस्त्रा॑ पु॒त्राय॑ मा॒तरो॑ वयन्ति । उ॒प॒प्र॒क्षे वृष॑णो॒ मोद॑माना दि॒वस्प॒था व॒ध्वो॑ य॒न्त्यच्छ॑ ॥ (६)
इसी सूर्य के लिए बुद्धिमान् यजमान यज्ञकर्म आरंभ करते हैं. उषारूपी माताएं इसी के लिए तेजस्वी कपड़े बुनती हैं. वर्षाकारी सूर्य के मिलन से प्रसन्न पत्नीरूपी किरणें आकाश मार्ग से हमारे पास आती हैं. (६)
For this sun, the wise people begin the yajnakarma. Ushari's mothers weave stunning clothes for this. Happy with the meeting of the rainy sun, the rays of the wife come to us from the way to the sky. (6)