हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 5.48.3

मंडल 5 → सूक्त 48 → श्लोक 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 48
आ ग्राव॑भिरह॒न्ये॑भिर॒क्तुभि॒र्वरि॑ष्ठं॒ वज्र॒मा जि॑घर्ति मा॒यिनि॑ । श॒तं वा॒ यस्य॑ प्र॒चर॒न्स्वे दमे॑ संव॒र्तय॑न्तो॒ वि च॑ वर्तय॒न्नहा॑ ॥ (३)
पत्थरों द्वारा रात एवं दिन में तैयार किए गए सोमरस से प्रसन्न होकर इंद्र मायावी वृत्र को मारने के लिए वज्र को तेज बनाते हैं. इंद्ररूपी सूर्य की सैकड़ों किरणें दिनों को लाती एवं विदा करती हुई आकाश में घूमती हैं. (३)
Pleased with the somras prepared by the stones at night and in the day, Indra sharpens the vajra to kill the elusive vritra. Hundreds of rays of the sun revolve in the sky, bringing in days and sending them away. (3)