ऋग्वेद (मंडल 5)
स॒प्त मे॑ स॒प्त शा॒किन॒ एक॑मेका श॒ता द॑दुः । य॒मुना॑या॒मधि॑ श्रु॒तमुद्राधो॒ गव्यं॑ मृजे॒ नि राधो॒ अश्व्यं॑ मृजे ॥ (१७)
उनचास संख्या वाले शक्तिशाली मरुतों ने एकत्र होकर मुझे सैकड़ों गाएं दीं. मरुतों द्वारा दिए गए गोरूप अथवा अश्वरूप धन को हमने गंगा तट पर प्राप्त किया. (१७)
Forty-nine powerful maruts gathered together and gave me hundreds of songs. We received the gorup or ashwarupa money given by the maruts on the banks of the Ganga. (17)