ऋग्वेद (मंडल 5)
धू॒नु॒थ द्यां पर्व॑तान्दा॒शुषे॒ वसु॒ नि वो॒ वना॑ जिहते॒ याम॑नो भि॒या । को॒पय॑थ पृथि॒वीं पृ॑श्निमातरः शु॒भे यदु॑ग्राः॒ पृष॑ती॒रयु॑ग्ध्वम् ॥ (३)
हे मरुतो! तुम आकाश में बादलों को इधर-उधर बिखेरो तथा हवि देने वाले यजमान को धन दो. तुम्हारे आने के डर से वन कांपने लगते हैं. हे उग्र एवं पृश्निपुत्र मरुतो! वर्षा द्वारा धरती को विचलित करो. तुम अपने रथ में बुंदकियों वाली घोड़ियां जोड़ते हो. (३)
O Maruto! You scatter the clouds around in the sky and give money to the host who gives you money. The forests begin to tremble for fear of your coming. O you of wrath and the beloved, Maruto! Distract the earth by rain. You add horses with bunts to your chariot. (3)