ऋग्वेद (मंडल 5)
यू॒यं राजा॑न॒मिर्यं॒ जना॑य विभ्वत॒ष्टं ज॑नयथा यजत्राः । यु॒ष्मदे॑ति मुष्टि॒हा बा॒हुजू॑तो यु॒ष्मत्सद॑श्वो मरुतः सु॒वीरः॑ ॥ (४)
हे यज्ञपात्र मरुतों तुम यजमान को ऐसा पुत्र दो जो शत्रुओं को पतित करने वाला व विभु नामक देवता द्वारा निर्मित हो. हे मरुतो! तुमसे प्राप्त होने वाला पुत्र स्वभुजबल से शत्रुनाशक, शत्रुओं पर हाथ उठाने वाला, अगणित अश्चों का स्वामी एवं शोभन शक्ति वाला हो. (४)
O Yagyapatras, you give the host a son who impures enemies and is made by a god named Vibhu. O Maruto! The Son who receives from you may be an enemy with self-force, a man who raises his hand on enemies, the master of countless wonders, and the one with the power of adornment. (4)