हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 5.64.4

मंडल 5 → सूक्त 64 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 64
यु॒वाभ्यां॑ मित्रावरुणोप॒मं धे॑यामृ॒चा । यद्ध॒ क्षये॑ म॒घोनां॑ स्तोतॄ॒णां च॑ स्पू॒र्धसे॑ ॥ (४)
हे मित्र एवं वरुण! तुम दोनों की स्तुति द्वारा हम ऐसा धन प्राप्त करेंगे, जिसके कारण धनस्वामियों एवं स्तोताओं के घरों में स्पर्धा होने लगे. (४)
Oh my friend and Varun! By praising both of you, we will receive such wealth, due to which competitions take place in the houses of wealthy and stothas. (4)