हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 5.64.7

मंडल 5 → सूक्त 64 → श्लोक 7 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 64
उ॒च्छन्त्यां॑ मे यज॒ता दे॒वक्ष॑त्रे॒ रुश॑द्गवि । सु॒तं सोमं॒ न ह॒स्तिभि॒रा प॒ड्भिर्धा॑वतं नरा॒ बिभ्र॑तावर्च॒नान॑सम् ॥ (७)
हे नेता मित्र व वरुण! उषाकाल की सुंदर किरणों वाले प्रातः सवन में एवं देवयज्ञ में निचोड़े गए सोमरस के कारण प्रसन्न होकर तुम अपने घोड़ों की सहायता से मुझ अर्चनाना के पास आओ. (७)
O leader, friend and Varun! Pleased with the somras squeezed in the morning and in the devyagna with the beautiful rays of ushakaal, you come to me archana with the help of your horses. (7)