ऋग्वेद (मंडल 5)
अ॒स्मिन्य॒ज्ञे अ॑दाभ्या जरि॒तारं॑ शुभस्पती । अ॒व॒स्युम॑श्विना यु॒वं गृ॒णन्त॒मुप॑ भूषथो॒ माध्वी॒ मम॑ श्रुतं॒ हव॑म् ॥ (८)
हे अपराजेय एवं जल के स्वामी अश्चिनीकुमारो! तुम इस यज्ञ में स्तुति करने वाले अवस्यु ऋषि पर कृपा करो. हे मधुविद्या जानने वालो! तुम हमारी पुकार सुनो. (८)
O unbeatable and the lord of the waters, Aschinikumaro! Please be kind to the sage Who praises you in this yajna. O you who know honey! You hear our call. (8)