ऋग्वेद (मंडल 5)
ए॒ताव॒द्वेदु॑ष॒स्त्वं भूयो॑ वा॒ दातु॑मर्हसि । या स्तो॒तृभ्यो॑ विभावर्यु॒च्छन्ती॒ न प्र॒मीय॑से॒ सुजा॑ते॒ अश्व॑सूनृते ॥ (१०)
हे उषा! तुम हमें प्रार्थित या अप्रार्थित सभी प्रकार का धन दे सकती हो. हे दीप्तिवाली उषा! तुम स्तोताओं के लिए अंधकार मिटाती हो एवं उनकी हिंसा नहीं करतीं. हे शोभन जन्म वाली उषा! लोग अश्च पाने के लिए तुम्हारी स्तुति करते हैं. (१०)
Oh, Usha! You can give us all kinds of money you have requested or unsolicited. O radiant Usha! You remove darkness for the Psalms and do not violence against them. O Shobhan born Usha! People praise you for getting ass. (10)