हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 5.81.2

मंडल 5 → सूक्त 81 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 81
विश्वा॑ रू॒पाणि॒ प्रति॑ मुञ्चते क॒विः प्रासा॑वीद्भ॒द्रं द्वि॒पदे॒ चतु॑ष्पदे । वि नाक॑मख्यत्सवि॒ता वरे॒ण्योऽनु॑ प्र॒याण॑मु॒षसो॒ वि रा॑जति ॥ (२)
मेधावी सविता विविधरूप धारण करते हैं एवं पशुओं व मानवों के लिए कल्याण की आज्ञा देते हैं. श्रेष्ठ सविता देव स्वर्ग को प्रकाशित करते हैं एवं उषा के उदित होने के पश्चात्‌ प्रकाश फैलाते हैं. (२)
The brilliant Savita wears diverse forms and commands welfare for animals and human beings. The superior Savita Dev illuminates heaven and spreads the light after Usha rises. (2)