हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 5.83.7

मंडल 5 → सूक्त 83 → श्लोक 7 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 83
अ॒भि क्र॑न्द स्त॒नय॒ गर्भ॒मा धा॑ उद॒न्वता॒ परि॑ दीया॒ रथे॑न । दृतिं॒ सु क॑र्ष॒ विषि॑तं॒ न्य॑ञ्चं स॒मा भ॑वन्तू॒द्वतो॑ निपा॒दाः ॥ (७)
हे पर्जन्य! शब्द एवं गर्जन करो, ओषधियों में गर्भ रूपी जल धारण करो, जलयुक्त रथ द्वारा सब ओर जाओ एवं चमड़े की मशक के समान बंधे हुए मेघ को नीचे की ओर खोलो, जिससे ऊंचे-नीचे स्थान बराबर हो जावें. (७)
O perspiration! Make words and thunders, put the water in the form of a womb in the herbs, go all around with a water-soaked chariot, and open the cloud tied like a leather mushk downwards, so that the high-lying positions become equal. (7)