ऋग्वेद (मंडल 5)
बळि॒त्था पर्व॑तानां खि॒द्रं बि॑भर्षि पृथिवि । प्र या भूमिं॑ प्रवत्वति म॒ह्ना जि॒नोषि॑ महिनि ॥ (१)
हे महती एवं शक्तिशालिनी पृथ्वी! तुम सभी प्राणियों को प्रसन्न करती हो एवं धारण करती हो. (१)
O earth of greatness and power! You please and hold all beings. (1)
ऋग्वेद (मंडल 5)
स्तोमा॑सस्त्वा विचारिणि॒ प्रति॑ ष्टोभन्त्य॒क्तुभिः॑ । प्र या वाजं॒ न हेष॑न्तं पे॒रुमस्य॑स्यर्जुनि ॥ (२)
हे विचरण करने वाली पृथ्वी! स्तोता गतिशील स्तोत्रों से तुम्हारी प्रशंसा करते हैं. हे श्वेतरंग वाली! तुम घोड़े के समान गरजने वाले बादल को दूर फेंकती हो. (२)
O wandering earth! The Psalms praise you with the dynamic hymns. Oh white- colored! You throw away a cloud that thunders like a horse. (2)
ऋग्वेद (मंडल 5)
दृ॒ळ्हा चि॒द्या वन॒स्पती॑न्क्ष्म॒या दर्ध॒र्ष्योज॑सा । यत्ते॑ अ॒भ्रस्य॑ वि॒द्युतो॑ दि॒वो वर्ष॑न्ति वृ॒ष्टयः॑ ॥ (३)
हे पृथ्वी! तुम्हारे बादल जब चमकते हुए जल बरसाते हैं, तब तुम अपनी शक्ति द्वारा वनस्पतियों को धारण करती हो. (३)
O earth! When your clouds rain shining water, you hold the vegetation by your power. (3)