हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 5.86.3

मंडल 5 → सूक्त 86 → श्लोक 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 5)

ऋग्वेद: | सूक्त: 86
तयो॒रिदम॑व॒च्छव॑स्ति॒ग्मा दि॒द्युन्म॒घोनोः॑ । प्रति॒ द्रुणा॒ गभ॑स्त्यो॒र्गवां॑ वृत्र॒घ्न एष॑ते ॥ (३)
शत्रुपराभवकारी बलयुक्त इंद्र एवं अग्नि जब एक रथ में बैठकर गायों को चुराने वाले वृत्र का नाश करने हेतु चलते हैं तब उन धनस्वामियों के हाथ में तेज धार वाला एवं चमकीला वज्र होता है. (३)
When Indra and Agni, with the enemy-defeating force, sit in a chariot and walk to destroy the vritra that steals cows, those wealthy ones have a sharp-edged and bright vajra in their hands. (3)