ऋग्वेद (मंडल 6)
त्वम॑ग्ने वनुष्य॒तो नि पा॑हि॒ त्वमु॑ नः सहसावन्नव॒द्यात् । सं त्वा॑ ध्वस्म॒न्वद॒भ्ये॑तु॒ पाथः॒ सं र॒यिः स्पृ॑ह॒याय्यः॑ सह॒स्री ॥ (१२)
हे अग्नि! शत्रु से हमारी रक्षा करो. हे शक्तिशाली अग्नि! पाप से हमारी रक्षा करो. हमारा दोषरहित हव्यान्न तुम्हारे समीप पहुंचे एवं तुम्हारा दिया हुआ हजारों प्रकार का धन हमें मिले. (१२)
O agni! Protect us from the enemy. O mighty agni! Protect us from sin. Our faultless desire came to you and we received thousands of kinds of money you had given us. (12)