हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 3
अग्ने॒ स क्षे॑षदृत॒पा ऋ॑ते॒जा उ॒रु ज्योति॑र्नशते देव॒युष्टे॑ । यं त्वं मि॒त्रेण॒ वरु॑णः स॒जोषा॒ देव॒ पासि॒ त्यज॑सा॒ मर्त॒मंहः॑ ॥ (१)
हे अग्नि! यज्ञपालनकर्ता एवं यज्ञ के हेतु जन्म देने वाला यजमान चिरकाल जीवित रहे एवं देवाभिलाषी बनकर तुम्हारी विशाल ज्योति धारण करे. हे अग्नि देव! तुम मित्र एवं वरुण के साथ मिलकर तेज द्वारा पाप से उसकी रक्षा करते हो. (१)
O agni! May the yajna-doer and the host who gives birth for the yagna live forever and be a godly person and hold on to your great light. O God of agni! You, together with friends and Varuna, protect him from sin by tej. (1)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 3
ई॒जे य॒ज्ञेभिः॑ शश॒मे शमी॑भिरृ॒धद्वा॑राया॒ग्नये॑ ददाश । ए॒वा च॒न तं य॒शसा॒मजु॑ष्टि॒र्नांहो॒ मर्तं॑ नशते॒ न प्रदृ॑प्तिः ॥ (२)
समृद्ध धन वाले अग्नि को हव्य देने वाला यजमान समस्त यज्ञों में सफल एवं चांद्रायणादि व्रतों द्वारा शांत बनाता है, यशस्वी संतान से रहित नहीं होता तथा पाप व घमंड से दूर रहता है. (२)
The host who gives a greeting to the agni with rich riches makes it successful in all the yagnas and calms down by the chandrayanadi vrats, is not devoid of successful children and stays away from sin and pride. (2)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 3
सूरो॒ न यस्य॑ दृश॒तिर॑रे॒पा भी॒मा यदेति॑ शुच॒तस्त॒ आ धीः । हेष॑स्वतः शु॒रुधो॒ नायम॒क्तोः कुत्रा॑ चिद्र॒ण्वो व॑स॒तिर्व॑ने॒जाः ॥ (३)
हे सूर्यतुल्य एवं पापरहित दर्शन वाले अग्नि! तुम्हारी भयानक ज्वालाएं सभी जगह जाती हैं. रात्रि में रंभाती हुई गाय के समान विस्तृत, सबके निवास एवं वन में उत्पन्न अग्नि बहुत कम स्थानों में रमणीय होते हैं. (३)
O agni of the sun and sinless vision! Your terrible flames go all over the place. As wide as a cow at night, the agnis produced in everyone's habitat and forest are delightful in very few places. (3)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 3
ति॒ग्मं चि॒देम॒ महि॒ वर्पो॑ अस्य॒ भस॒दश्वो॒ न य॑मसा॒न आ॒सा । वि॒जेह॑मानः पर॒शुर्न जि॒ह्वां द्र॒विर्न द्रा॑वयति॒ दारु॒ धक्ष॑त् ॥ (४)
अग्नि का मार्ग तीक्ष्ण एवं रूप परम दीप्तिशाली है. वे घोड़ों के समान मुख से घास आदि भक्षण करते हैं. वे फरसे के समान काठ पर अपनी जीभ चलाते हैं एवं सोने को गलाते हुए सुनार के समान पिघला देते हैं. (४)
The path of agni is sharp and the form of the agni is extremely bright. They eat grass etc. from the mouth like horses. They run their tongues on the wood like a floor and melt the gold like a goldsmith. (4)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 3
स इदस्ते॑व॒ प्रति॑ धादसि॒ष्यञ्छिशी॑त॒ तेजोऽय॑सो॒ न धारा॑म् । चि॒त्रध्र॑जतिरर॒तिर्यो अ॒क्तोर्वेर्न द्रु॒षद्वा॑ रघु॒पत्म॑जंहाः ॥ (५)
अग्नि बाण फेंकने वाले के समान अपनी ज्वालाएं आगे बढ़ाते हैं एवं फरसे की धार के समान तेज करते हैं. वे विचित्र गति एवं पैर सिकोड़कर रात में वृक्ष पर निवास करने वाले पक्षी के समान रात बिताते हैं. (५)
Fire arrows move their flames forward like a thrower and accelerate like a stream of furrows. They spend the night at night like a bird living on a tree with strange motions and legs shrinking. (5)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 3
स ईं॑ रे॒भो न प्रति॑ वस्त उ॒स्राः शो॒चिषा॑ रारपीति मि॒त्रम॑हाः । नक्तं॒ य ई॑मरु॒षो यो दिवा॒ नॄनम॑र्त्यो अरु॒षो यो दिवा॒ नॄन् ॥ (६)
अग्नि स्तुतियोग्य सूर्य के समान तेजस्वी किरणें फैलाते हैं, सबके अनुकूल प्रकाश बढ़ाते हुए अपने तेज से शब्द करते हैं एवं रात में प्रकाशित होकर लोगों को दिन के समान अपने-अपने काम में लगा देते हैं. तेजस्वी एवं मरणरहित अग्नि दिन में देवों के प्रति अपनी किरणें भेजते हैं. (६)
The agni spreads bright rays like the praiseworthy sun, makes words with its brightness, increasing the light to suit everyone, and illuminates them at night and puts people in their respective work like the day. The bright and deathless agni sends its rays towards the gods during the day. (6)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 3
दि॒वो न यस्य॑ विध॒तो नवी॑नो॒द्वृषा॑ रु॒क्ष ओष॑धीषु नूनोत् । घृणा॒ न यो ध्रज॑सा॒ पत्म॑ना॒ यन्ना रोद॑सी॒ वसु॑ना॒ दं सु॒पत्नी॑ ॥ (७)
अग्नि दीप्त सूर्य के समान किरणें विस्तृत करने वाले, कामपूरक व तेजस्वी हैं तथा ओषधियों के मध्य में भारी ध्वनि करते हैं. दीप्त एवं गतिशील तेज द्वारा चलने वाले अग्नि हमारे शन्रुओं को वश में करते हुए धरती-आकाश को धन से पूर्ण करते हैं. (७)
The agni-light is as bright as the sun,radiating rays, are full and bright and make a heavy sound in the middle of the herbs. The agnis that run by the bright and dynamic fast subdue our enemies fill the earth and the sky with wealth. (7)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 3
धायो॑भिर्वा॒ यो युज्ये॑भिर॒र्कैर्वि॒द्युन्न द॑विद्यो॒त्स्वेभिः॒ शुष्मैः॑ । शर्धो॑ वा॒ यो म॒रुतां॑ त॒तक्ष॑ ऋ॒भुर्न त्वे॒षो र॑भसा॒नो अ॑द्यौत् ॥ (८)
जो अग्नि स्वयं रथ में जुड़ने वाले घोड़ों के समान किरणों के साथ आगे बढ़ते हैं, वे अपने तेजों द्वारा बिजली के समान चमकते हैं. मरुतों की शक्ति सीमित करने वाले, सूर्य के समान तेजस्वी एवं वेगशाली अग्नि प्रकाशित होते हैं. (८)
The agnis that move forward with the same rays as the horses joining the chariot themselves shine like lightning by their radiances. The powerful and fast agnis like the sun are illuminated, which limit the power of the maruts. (8)