हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 34
सं च॒ त्वे ज॒ग्मुर्गिर॑ इन्द्र पू॒र्वीर्वि च॒ त्वद्य॑न्ति वि॒भ्वो॑ मनी॒षाः । पु॒रा नू॒नं च॑ स्तु॒तय॒ ऋषी॑णां पस्पृ॒ध्र इन्द्रे॒ अध्यु॑क्था॒र्का ॥ (१)
हे इंद्र! तुम में बहुत से स्तुति-वचन मिलते हैं. स्तोताओं की विस्तृत विचारधाराएं तुम्हीं से निकलती हैं. प्राचीन एवं वर्तमान ऋषियों की स्तुतियां, मंत्र एवं उपासना इंद्र के विषय में एक-दूसरे से बढ़कर हैं. (१)
O Indra! There are many words of praise in you. The broad ideologies of the psalms emanate from you. The praises, mantras and worship of ancient and present sages are more than each other about Indra. (1)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 34
पु॒रु॒हू॒तो यः पु॑रुगू॒र्त ऋभ्वा॒ँ एकः॑ पुरुप्रश॒स्तो अस्ति॑ य॒ज्ञैः । रथो॒ न म॒हे शव॑से युजा॒नो॒३॒॑ऽस्माभि॒रिन्द्रो॑ अनु॒माद्यो॑ भूत् ॥ (२)
हम लोग बहुतों द्वारा बुलाए गए, बहुतों द्वारा प्रोत्साहित महान्‌, अद्वितीय एवं बहुतों दवारा स्तुत इंद्र को यज्ञ द्वारा प्रसन्न करते हैं. इंद्र रथ के समान महान्‌ शक्ति प्राप्त करने के लिए हमारे द्वारा सदा स्तुति का विषय बनें. (२)
We please the great, unique and many-called Indra, who was called by many, encouraged by many, through yajna. Always be the subject of praise by us to achieve the same great power as indra rath. (2)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 34
न यं हिंस॑न्ति धी॒तयो॒ न वाणी॒रिन्द्रं॒ नक्ष॒न्तीद॒भि व॒र्धय॑न्तीः । यदि॑ स्तो॒तारः॑ श॒तं यत्स॒हस्रं॑ गृ॒णन्ति॒ गिर्व॑णसं॒ शं तद॑स्मै ॥ (३)
सेवाकर्म एवं स्तुति-वचन इंद्र को बाधा नहीं पहुंचा सकते. इंद्र की वृद्धि करती हुई स्तुतियां उनके सामने जाती हैं. सैकड़ों एवं हजारों स्तोता स्तुतिपात्र इंद्र की स्तुति करके उन्हें प्रसन्न करते हैं. (३)
The words of service and praise cannot hinder Indra. Indra's growing praises go before him. Hundreds and thousands of hymns please him by praising Indra. (3)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 34
अस्मा॑ ए॒तद्दि॒व्य१॒॑र्चेव॑ मा॒सा मि॑मि॒क्ष इन्द्रे॒ न्य॑यामि॒ सोमः॑ । जनं॒ न धन्व॑न्न॒भि सं यदापः॑ स॒त्रा वा॑वृधु॒र्हव॑नानि य॒ज्ञैः ॥ (४)
आज यज्ञ में इंद्र को स्तोत्रों के साथ अर्पित करने हेतु मंत्रों-सहित सोमरस तैयार है. जिस प्रकार मरुभूमि की ओर बहने वाला जल मनुष्यों का पालन करता है, उसी प्रकार यज्ञ के साथ दिए गए हव्य इंद्र को पुष्ट करें. (४)
Today, somras with mantras are ready to offer indra with hymns in the yagna. Just as the water flowing towards the desert follows humans, so do the havya Indra given with yajna. (4)

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 34
अस्मा॑ ए॒तन्मह्या॑ङ्गू॒षम॑स्मा॒ इन्द्रा॑य स्तो॒त्रं म॒तिभि॑रवाचि । अस॒द्यथा॑ मह॒ति वृ॑त्र॒तूर्य॒ इन्द्रो॑ वि॒श्वायु॑रवि॒ता वृ॒धश्च॑ ॥ (५)
स्तोताओं द्वारा इंद्र के लिए यह स्तोत्र इसलिए बोला जाता है, जिससे संग्राम में वह हमारे रक्षक एवं वृद्धिकर्ता हों. (५)
This hymn is spoken by the Psalms for Indra so that he is our protector and enhancer in the struggle. (5)