ऋग्वेद (मंडल 6)
यदि॑न्द्र॒ सर्गे॒ अर्व॑तश्चो॒दया॑से महाध॒ने । अ॒स॒म॒ने अध्व॑नि वृजि॒ने प॒थि श्ये॒नाँ इ॑व श्रवस्य॒तः ॥ (१३)
हे इंद्र! महान् धन के निमित्त संग्राम आरंभ होने पर हमारे घोड़ों को ऊंचे-नीचे रास्ते पर इस प्रकार आगे बढ़ाना, जिस प्रकार कुटिल पथ पर मांस का इच्छुक बाज बढ़ता है. (१३)
O Indra! When the struggle for great wealth begins, we should move our horses on the path of high and low in such a way as the willing hawk of meat grows on the crooked path. (13)