ऋग्वेद (मंडल 6)
इन्द्र॑स्य॒ वज्रो॑ म॒रुता॒मनी॑कं मि॒त्रस्य॒ गर्भो॒ वरु॑णस्य॒ नाभिः॑ । सेमां नो॑ ह॒व्यदा॑तिं जुषा॒णो देव॑ रथ॒ प्रति॑ ह॒व्या गृ॑भाय ॥ (२८)
हे दिव्य रथ! तुम इंद्र के वज्ज, मरुतों के आगे चलने वाले, मित्र के गर्भ एवं वरुण की नाभि हो. इस यज्ञ में तुम यज्ञक्रिया देखते हुए हव्य स्वीकार करो. (२८)
O divine chariot! You are the vajja of Indra, the one who walks before the maruts, the womb of a friend and the navel of Varuna. In this yajna, you accept the havan while watching the yajna kriya. (28)