हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 6.59.4

मंडल 6 → सूक्त 59 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 6)

ऋग्वेद: | सूक्त: 59
य इ॑न्द्राग्नी सु॒तेषु॑ वां॒ स्तव॒त्तेष्वृ॑तावृधा । जो॒ष॒वा॒कं वद॑तः पज्रहोषिणा॒ न दे॑वा भ॒सथ॑श्च॒न ॥ (४)
हे यज्ञ की वृद्धि करने वाले इंद्र एवं अग्नि! तुम्हारा स्तोत्र प्रसिद्ध है. जो यजमान सोमरस निचुड़ जाने पर प्रीतिरहित शब्दों से तुम्हारी बुरी स्तुति करता है उसका सोमरस तुम कभी नहीं स्वीकार करते. (४)
O Indra and Agni who increase the yajna! Your stotra is famous. You never accept the Somras of the host who praises you badly with unloved words when the host somers are gone. (4)