ऋग्वेद (मंडल 6)
इन्द्रा॑ग्नी अ॒पादि॒यं पूर्वागा॑त्प॒द्वती॑भ्यः । हि॒त्वी शिरो॑ जि॒ह्वया॒ वाव॑द॒च्चर॑त्त्रिं॒शत्प॒दा न्य॑क्रमीत् ॥ (६)
हे इंद्र एवं अग्नि! यह बिना चरणों वाली उषा चरणों वाली प्रजाओं से पहले धरती पर आती है. यह बिना शीश की होकर भी प्राणियों की वाणी से बहुत से शब्द करती हुई घूमती है. इस प्रकार यह तीस कदम आगे बढ़ गई है. (६)
O Indra and Agni! It comes to earth before the unsused usha-footed species. It moves around without a mirror, saying many words from the voice of beings. Thus it has gone thirty steps further. (6)