ऋग्वेद (मंडल 6)
इन्द्रा॑वरुणा सुतपावि॒मं सु॒तं सोमं॑ पिबतं॒ मद्यं॑ धृतव्रता । यु॒वो रथो॑ अध्व॒रं दे॒ववी॑तये॒ प्रति॒ स्वस॑र॒मुप॑ याति पी॒तये॑ ॥ (१०)
हे सोमकर्ता इंद्र एवं वरुण! इस नशीले एवं निचोड़े हुए सोमरस को पिओ. हे ब्रतधारको! तुम्हारा रथ देवों के साथ सोमपान के निमित्त यज्ञ के मार्ग पर बढ़ता है. (१०)
O Somakars Indra and Varuna! Drink this intoxicating and squeezed somras. O brittadharko! Your chariot grows on the path of yajna for the sake of sompan with the gods. (10)