ऋग्वेद (मंडल 6)
घृ॒तेन॒ द्यावा॑पृथि॒वी अ॒भीवृ॑ते घृत॒श्रिया॑ घृत॒पृचा॑ घृता॒वृधा॑ । उ॒र्वी पृ॒थ्वी हो॑तृ॒वूर्ये॑ पु॒रोहि॑ते॒ ते इद्विप्रा॑ ईळते सु॒म्नमि॒ष्टये॑ ॥ (४)
द्यावा-पृथ्वी जल से ढकी हुई, जल को सहारा देती हुई, जल से व्याप्त, जल की वृद्धि करने वाली, विस्तृत, प्रसिद्ध व यज्ञ में यजमानों द्वारा पुरस्कृत हैं. विद्वान् यज्ञ करने के निमित्त इनसे सुख की याचना करते हैं. (४)
The dyava-earth is covered with water, supporting water, pervading water, water-enhancing, elaborate, famous and rewarded by the hosts in the yagna. The scholars beg them for happiness in order to perform yajna. (4)