ऋग्वेद (मंडल 6)
व्य॑स्तभ्ना॒द्रोद॑सी मि॒त्रो अद्भु॑तोऽन्त॒र्वाव॑दकृणो॒ज्ज्योति॑षा॒ तमः॑ । वि चर्म॑णीव धि॒षणे॑ अवर्तयद्वैश्वान॒रो विश्व॑मधत्त॒ वृष्ण्य॑म् ॥ (३)
सबके सखा एवं अदभुत वैश्वानर अग्नि ने धरती-आकाश को विशेष रूप से स्थिर किया है तथा तेज द्वारा अंधकार को मिटाया है. उन्होंने अंतरिक्ष को चमड़े के समान फैलाया है. वे समस्त शक्तियों को धारण करते हैं. (३)
The wonderful and wonderful Vaishvanar Agni has specially stabilized the earth and the sky and has eliminated the darkness by speed. They have spread the space like leather. They hold all the powers. (3)