ऋग्वेद (मंडल 7)
नू मर्तो॑ दयते सनि॒ष्यन्यो विष्ण॑व उरुगा॒याय॒ दाश॑त् । प्र यः स॒त्राचा॒ मन॑सा॒ यजा॑त ए॒ताव॑न्तं॒ नर्य॑मा॒विवा॑सात् ॥ (१)
जो मनुष्य बहुत से लोगों द्वारा प्रशंसायोग्य विष्णु को हव्य देता है, एक साथ बहुत से मंत्र बोलकर पूजा करता है एवं मानवहितकारी विष्णु की सेवा करता है, वह मनुष्य अपने इच्छित धन को शीघ्र प्राप्त करता है. (१)
The man who gives a greeting to Vishnu, who is praised by many people, worships by speaking many mantras at the same time and serves the man-benevolent Vishnu, that man gets his desired wealth quickly. (1)
ऋग्वेद (मंडल 7)
त्वं वि॑ष्णो सुम॒तिं वि॒श्वज॑न्या॒मप्र॑युतामेवयावो म॒तिं दाः॑ । पर्चो॒ यथा॑ नः सुवि॒तस्य॒ भूरे॒रश्वा॑वतः पुरुश्च॒न्द्रस्य॑ रा॒यः ॥ (२)
हे विष्णु! तुम हम पर ऐसी कृपा करो जो सबका हित करने वाली एवं दोषहीन हो. तुम ऐसी कृपा करो, जिससे भली प्रकार प्राप्त करने योग्य, अनेक अश्वों से युक्त एवं बहुतों को प्रसन्न करने वाला धन प्राप्त हो. (२)
O Vishnu! May you have mercy on us who are undeserved and blameless to all. Please be kind that you may receive riches well, containing many horses and pleasing to many. (2)
ऋग्वेद (मंडल 7)
त्रिर्दे॒वः पृ॑थि॒वीमे॒ष ए॒तां वि च॑क्रमे श॒तर्च॑सं महि॒त्वा । प्र विष्णु॑रस्तु त॒वस॒स्तवी॑यान्त्वे॒षं ह्य॑स्य॒ स्थवि॑रस्य॒ नाम॑ ॥ (३)
विष्णुदेव ने सौ किरणों वाली धरती पर अपनी महिमा से तीन बार चरण रखा. वृद्धों से भी वृद्ध विष्णु हमारे स्वामी हों. वृद्धिप्राप्त विष्णु का रूप तेजशाली है. (३)
Vishnudev set his feet on the earth of hundred rays three times with his glory. May Vishnu, older than the elderly, be our lord. The form of the rising Vishnu is bright. (3)
ऋग्वेद (मंडल 7)
वि च॑क्रमे पृथि॒वीमे॒ष ए॒तां क्षेत्रा॑य॒ विष्णु॒र्मनु॑षे दश॒स्यन् । ध्रु॒वासो॑ अस्य की॒रयो॒ जना॑स उरुक्षि॒तिं सु॒जनि॑मा चकार ॥ (४)
धरती को मानवों के निवास के निमित्त देने के विचार से विष्णु ने उस पर तीन बार चरण रखे. विष्णु के स्तोता निश्चल हो जाते हैं. शोभन जन्म वाले विष्णु ने विस्तृत निवासस्थान बनाया है. (४)
With the idea of giving the earth for the sake of human habitation, Vishnu set a foot on it three times. Vishnu's stothas become motionless. Vishnu, who was born shobhan, has made a wide abode. (4)
ऋग्वेद (मंडल 7)
प्र तत्ते॑ अ॒द्य शि॑पिविष्ट॒ नामा॒र्यः शं॑सामि व॒युना॑नि वि॒द्वान् । तं त्वा॑ गृणामि त॒वस॒मत॑व्या॒न्क्षय॑न्तम॒स्य रज॑सः परा॒के ॥ (५)
हे तेजस्वी विष्णु! स्तुतियों के स्वामी एवं जानने योग्य बातों को जानने वाले हम आज तुम्हारे प्रसिद्ध नाम को कहेंगे. हम वृद्धिरहित होकर भी अत्यंत वृद्धिशाली तुम्हारी स्तुति करेंगे. तुम रज अर्थात् धरालोक के परे रहते हो. (५)
O bright Vishnu! The lord of the praises and those who know things worth knowing, we will call your famous name today. We will praise you even without growth, even if we are very prosperous. You live beyond Raja i.e. Dharalok. (5)
ऋग्वेद (मंडल 7)
किमित्ते॑ विष्णो परि॒चक्ष्यं॑ भू॒त्प्र यद्व॑व॒क्षे शि॑पिवि॒ष्टो अ॑स्मि । मा वर्पो॑ अ॒स्मदप॑ गूह ए॒तद्यद॒न्यरू॑पः समि॒थे ब॒भूथ॑ ॥ (६)
हे विष्णु! मैं तुम्हारा नाम किरणों से युक्त बताता हूं. इस नाम को स्वीकार न करना क्या तुम्हें उचित है? तुमने युद्ध में दूसरा रूप धारण किया था. तुम हमसे अपना रूप मत छिपाओ. (६)
O Vishnu! I'll tell you your name containing rays. Is it fair for you not to accept this name? You took another form in the war. Don't hide your look from us. (6)
ऋग्वेद (मंडल 7)
वष॑ट् ते विष्णवा॒स आ कृ॑णोमि॒ तन्मे॑ जुषस्व शिपिविष्ट ह॒व्यम् । वर्ध॑न्तु त्वा सुष्टु॒तयो॒ गिरो॑ मे यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥ (७)
हे विष्णु! मैं यज्ञ में तुम्हारे लिए अपने मुख से वषट् शब्द बोलता हूं. हे तेजस्वी विष्णु! तुम हमारे हव्य को स्वीकार करो. हमारी शोभनस्तुति के वाक्य तुम्हारी वृद्धि करें. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारा सदा पालन करो. (७)
O Vishnu! I speak the word for you from my mouth in the yajna. O bright Vishnu! You accept our havya. Let the sentences of our adornment increase yours. Oh, God! You always follow us by means of well-being. (7)