ऋग्वेद (मंडल 7)
व॒यमि॑न्द्र त्वा॒यवो॒ऽभि प्र णो॑नुमो वृषन् । वि॒द्धी त्व१॒॑स्य नो॑ वसो ॥ (४)
हे अभिलाषापूरक इंद्र! तुम्हारी अभिलाषा करने वाले हम लोग तुम्हारी अधिक स्तुति करते हैं. हे निवासदाता इंद्र! हमारी स्तुति को तुम शीघ्र जानो. (४)
Oh, this desireful Indra! We who wish you more praise you. O Lord Indra! You will know our praise soon. (4)